क्या होगा अगर नासा के सभी भारतीय वैज्ञानिक इसरो लौट आए?

क्या होगा अगर नासा के सभी भारतीय वैज्ञानिक इसरो लौट आए?

दोस्तों, आज हम आपको बताने वाले हैं कि अगर नासा में काम करने वाले सभी भारतीय वैज्ञानिक वापस इंडिया लौट आए और इसरो में काम करने लगे तो क्या होगा? तो दोस्तों ब्लॉग को पूरा पढ़े और अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें चलिए शुरू करते हैं, क्या होगा अगर नासा के सभी भारतीय वैज्ञानिक इसरो लौट आए?

 

दोस्तों, नासा में कुल 17,240 कर्मचारी काम करते हैं।  जिसमें अलग-अलग देशों के लोग होते हैं। हमने आपको नासा बनाम इसरो ब्लॉग में बताया था की टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार नासा में करीब 36% लोग सिर्फ भारतीय या फिर भारतीय-अमेरिकी है। जो नासा के सभी मिशन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। वहीं इसरो में कुल 16,072 कर्मचारी काम करते हैं। और यह सभी भारतीय हीं हैं। तो दोस्तों अब यह सवाल तो आपके मन में भी उठ रहा होगा कि ऐसे कौन से कारण हैं, कि यह भारतीय वैज्ञानिक इसरो में काम नहीं करते और नासा चले जाते हैं? चलिए जानते हैं।

  नासा इसरो
कर्मचारीयों की संख्यां  17,240 16,07

 

दोस्तों, इसरो और नासा के बजट की बात करें तो एक तरफ जहां नासा का सालाना बजट 21.5 अरब डॉलर है तो इसरो का सालाना बजट 1.7 अरब डालर है। मतलब नासा का बजट इसरो से 12 गुना से भी ज्यादा है। नासा में नए-नए प्रोजेक्ट पर काम करने की आज़ादी है क्योंकि वहां बजट की कोई कमी नहीं। लेकिन इसरो में वही महंगे प्रोजेक्ट को नए-नए टेक्निक्स के जरिए सस्ते बजट मैं सफल बनाने पर जोर दिया जाता है।

  नासा इसरो
सालाना बजट 21.5 अरब डॉलर 1.7 अरब डालर

 

दोस्तों, अगर नासा और इसरो के कर्मचारियों को मिलने वाली सैलरी की बात करें तो नासा के बैज्ञानिकों की औसतन सालाना सैलरी 62,500 डॉलर है। वहीं इसरो के वैज्ञानिकों की औसतन सैलरी 7,500 डॉलर है। अगर बात करें सहायकों के सालाना सैलरी की तो नासा में औसतन 29,000 डॉलर मिलते हैं। वहीँ इसरो में सहायकों को 2,800 डॉलर हीं मिलते हैं। बता दें कि नासा में सबसे ज्यादा सालाना सैलरी लीड इंजीनियर की होती है, जो कि 1,26,000 डॉलर है।

  नासा इसरो
बैज्ञानिकों की औसतन सालाना सैलरी 62,500 डॉलर 7,500 डॉलर
सहायकों की औसतन सालाना सैलरी 29,000 डॉलर 2,800 डॉलर

इससे आप देख हीं सकते हैं कि इसरो और नासा के कर्मचारियों की सैलरी में कितना बड़ा अंतर है।

 

Kalpana Chawla
Kalpana Chawla

दोस्तों, अब आपको बताते हैं नासा में काम करने वाले कुछ भारतीय मूल के वैज्ञानिकों के बारे में… सुनीता विलियम्स का नाम तो आपने सुना हीं होगा एक अंतरिक्ष यात्री के तौर पर वह दो बार अंतरिक्ष में जा चुकी हैं। और नासा के पहले मानव मंगल मिशन का हिस्सा भी है। कल्पना चावला जो कोलंबिया स्पेस शटल में अंतरिक्ष यात्री थी और अंतरिक्ष में गई थी। इसके अलावा अश्विन बसवाड़ा नासा के मार्स क्रियोसिटी रोवर मिशन का हिस्सा हैं। डॉक्टर मेया मेयप्पन भविष्य के स्पेस एक्सप्लोरेशन के लिए नैनोटेक्नोलॉजी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। और भी ऐसे बहुत से वैज्ञानिक हैं।

 

 

 

वैसे अगर यह सभी वैज्ञानिक नासा को छोड़कर वापस भारत आ जाए और इसरो में काम करें तो क्या होगा?

 

इसके लिए सबसे पहले इसरो का बजट बढ़ाना होगा। नए नए प्रोजेक्ट्स पर नासा से आए हुए हमारे भारतीय वैज्ञानिको के सहयोग से हम वह उपलब्धियां प्राप्त कर सकते हैं जो नासा ने कभी सोचा भी नहीं होगा। पूरी दुनियां में इसरो, बहुत कम बजट में सफल मिशन को करने के लिए मशहूर है। इसरो का बजट नासा के बजट का सिर्फ 50 फ़ीसदी भी हो जाए और नासा के भारतीय वैज्ञानिक इसरो में आ जाए तो इसरो को दुनियां की सबसे बेहतरीन स्पेस एजेंसी बनने से कोई नहीं रोक सकता।

 

ISRO Mars Mission
ISRO Mars Mission

दोस्तों, इसरो का मंगल-यान मिशन पहली बार में मंगल पर पहुंचने वाला दुनियां का पहला मंगल मिशन था। इसका बजट सिर्फ 74 मिलियन डॉलर था जो नासा के MAVEN मार्स मिशन का सिर्फ 11% है। ऐसे में अगर हमारी सरकार इसरो का बजट बढ़ाने की ओर काम करे और यहां कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं को बेहतर बनाए तो भारत के युवा वैज्ञानिक नासा और दूसरी विदेशी स्पेस एजेंसी में जाने का सोचेंगे भी नहीं।

 

 

 

 

 

दोस्तों चलिए आपको कुछ रोचक तथ्य बताते हैं,

  • एक औसत सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए जहां नासा 60 मिलियन डॉलर चार्ज करता है, वहीँ एक औसत सेटेलाइट को लांच करने के लिए इसरो सिर्फ तीन मिलियन डॉलर चार्ज करता है। जी हां सिर्फ तीन मिलियन डॉलर। यानी नासा से 20 गुना कम खर्च में इसरो एक सैटेलाइट को अंतरिक्ष की लो ऑर्बिट में स्थापित कर देता है।
  • 15 फरवरी 2017 को इसरो ने अपने पीएसएलवी-सी37 सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल से एक हीं फ्लाइट में 104 सेटेलाइट को लांच करके पूरी दुनियां को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि कम बजट और बेहतरीन तकनीक और मेहनत के बलबूते पर सफल मिशन भी हो सकता है।
  • अभी हाल हीं में मिशन शक्ति के अंतर्गत इसरो ने लो ऑर्बिट सैटेलाइट को टारगेट कर दिखाया, और एंटी सैटेलाइट कैपेबिलिटी रखने वाला दुनियां का चौथा देश बन गया। इस मिशन के लिए भी हमारा बजट दूसरी स्पेस एजेंसीज की तुलना में काफी कम था।

 

इससे यह बात तो साफ हो जाती है कि इसरो में काबिलियत की कोई कमी नहीं है। कमी है तो बस बजट और सुविधाओं की और इन सब को दिशा देने के लिए नासा में काम करने वाले भारतीय वैज्ञानिक वापस लौट आए तो इसरो की प्रसिद्धि और कामयाबी में चार चांद लगने तय हैं।

 

दोस्तों अब यहीं खत्म करते हैं। अपने महत्वपूर्ण सुझाव कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। हमें इसका इंतजार रहेगा।

 

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